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बुंदेलखंड में तितलियों की रंगीन उड़ान

सेव बटरफ्लाई’ कार्यक्रम ने जगाई पर्यावरण संरक्षण की नई चेतना

ललितपुर

मानव ऑर्गेनाइजेशन के ‘गौरैया बचाओ अभियान’ और भारतीय जैव विविधता संरक्षण संस्थान झांसी के संयुक्त प्रयास से ‘सेव बटरफ्लाई’ कार्यक्रम की शुरुआत की गई है। इस अभियान का उद्देश्य नागरिकों को तितलियों की गिनती, पहचान और संरक्षण के लिए प्रेरित करना है। बुंदेलखंड क्षेत्र के झांसी और ललितपुर जनपदों में इन दिनों तितलियों की अद्भुत विविधता देखने को मिल रही है। विद्यालय परिसरों, बाग-बगीचों और खेतों में उड़ती रंग-बिरंगी तितलियाँ पर्यावरण प्रेमियों और विद्यार्थियों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं।

पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार तितलियों की यह सक्रिय उपस्थिति स्थानीय पौधों की बहुलता, अनुकूल मौसम और नागरिकों में संरक्षण के प्रति बढ़ती जागरूकता का सकारात्मक परिणाम है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि नागरिक थोड़े से प्रयास करें तो शहरों और गांवों दोनों में तितलियों के लिए सुरक्षित स्थल विकसित किए जा सकते हैं। वर्तमान में इस क्षेत्र में पाई जाने वाली 70 से अधिक तितली प्रजातियों में कॉमन क्रो, कॉमन टाइगर, प्लेन टाइगर, कॉमन जेजेबेल, कॉमन ग्रास येलो, कॉमन रोज, ब्लू टाइगर, लेमन पैंसी, पीकॉक पैंसी, कॉमन लेपर्ड और कॉमन कास्टर प्रमुख रूप से देखी जा रही हैं।

भारतीय जैव विविधता संरक्षण संस्थान की संयोजक डॉ. सोनिका कुशवाहा ने कहा कि तितलियाँ केवल सौंदर्य का प्रतीक नहीं बल्कि जैविक विविधता की सेहत का संकेतक होती हैं। जहाँ तितलियों की संख्या बढ़ रही है, वहाँ पर्यावरण का संतुलन अच्छा माना जाता है। युवाओं और विद्यालयों को इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए समृद्ध प्राकृतिक धरोहर संरक्षित रह सके।

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पर्यावरणविद पुष्पेन्द्र सिंह चौहान ने बताया कि तितलियाँ पौधों के परागण में अहम भूमिका निभाती हैं और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में सहायक होती हैं। लेकिन कीटनाशकों और कंक्रीट के बढ़ते विस्तार के कारण इनका प्राकृतिक आवास सिकुड़ता जा रहा है। उन्होंने कहा कि हमें ऐसे “बटरफ्लाई गार्डन” विकसित करने चाहिए, जहाँ स्थानीय पौधों की खेती हो और रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग न्यूनतम किया जाए।

नेहरू महाविद्यालय ललितपुर के पर्यावरणविद् डॉ. राजीव कुमार निरंजन ने कहा कि विद्यालयों और कॉलेजों के विद्यार्थी यदि अपने परिसरों में तितली-मैत्री पौधे जैसे लैंटाना, कसिया, लेमनग्रास, करेला और सिट्रस प्रजातियों को लगाएंगे, तो यह न केवल अध्ययन का विषय बनेगा बल्कि जैविक शिक्षा का उत्कृष्ट प्रयोगात्मक माध्यम भी होगा। विद्यार्थियों के ऐसे प्रयास तितली संरक्षण को जन-आंदोलन का रूप देंगे।

विशेषज्ञों के अनुसार तितलियाँ पर्यावरण की नाजुक लेकिन जीवनदायिनी कड़ी हैं। वे फूलों का रस पीते हुए परागण करती हैं और अनेक पक्षियों व जीवों के लिए भोजन स्रोत बनती हैं। मानसून का मौसम तितलियों के प्रजनन के लिए सर्वोत्तम समय होता है, जबकि अगस्त से दिसंबर तक का समय “बटरफ्लाई वॉचिंग” के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है।

घर या विद्यालय परिसर में तितलियों को आकर्षित करने के लिए विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि नेकटार देने वाले पौधे जैसे पेंटास, लैंटाना, मैरीगोल्ड, जैस्मीन और कॉसमॉस के साथ-साथ लार्वा होस्ट पौधे जैसे करेला, नींबू और कसिया ट्री लगाए जाएं। ऐसे छोटे प्रयास भी तितली संरक्षण में बड़ा योगदान दे सकते हैं। बुंदेलखंड की तितली विविधता इस बात का प्रमाण है कि यदि सामुदायिक सहयोग और पर्यावरणीय संवेदनशीलता हो, तो जैव विविधता का पुनर्जागरण पूरी तरह संभव है।

रिपोर्ट – आर. के. पटेल
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