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Uttar Pradesh; गिरार पुलिस पर गंभीर आरोप, लेनदेन से उजड़ा परिवार

मारपीट से टूटा घर, गर्भ में बुझी जिंदगी, कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल

गिरार /ललितपुर

थाना गिरार क्षेत्र का एक मामला अब पुलिस की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है। 10 मार्च 2026 को ग्राम सेमरखेड़ा में हुए जानलेवा हमले के बाद 31 मार्च को गर्भ में बच्चे की मौत ने पूरे घटनाक्रम को बेहद संवेदनशील और गंभीर बना दिया है।

पीड़ित परिवार का आरोप है कि इस पूरे मामले में गिरार पुलिस की भूमिका संदिग्ध रही और लेनदेन के चलते आरोपियों को संरक्षण मिला, जिससे आज एक परिवार पूरी तरह उजड़ गया।

घटना के अनुसार, पीड़ित सुरेश, उनकी गर्भवती पत्नी सुनीता और पुत्र विक्रम पर गांव के पास बढ़वार के पांच लोगों ने एक राय होकर लाठी-डंडों से हमला किया। इस हमले में सुरेश की हाथ हड्डी टूट गई, पसली और सर फुट गया और अन्य गंभीर चोट आई, जबकि गर्भवती सुनीता के दोनों हाथ टूट गए और लाठी डंडों की और लातो की चोटे उसके पेट मे भी आईं,

परिवार का कहना है कि उन्होंने पांच नामों के साथ तहरीर दी थी, लेकिन पुलिस ने खुद तहरीर लिखवाकर केवल तीन लोगों पर ही मुकदमा दर्ज किया। सवाल उठ रहा है कि आखिर दो आरोपियों के नाम क्यों हटाए गए?

सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि जब पीड़ितों की हालत गंभीर थी, हाथ-पांव टूटे हुए थे, तब भी पुलिस ने इतने गम्भीर मामले में महज BNS की धारा 115 (2), 352, 351(3) की मामूली सी धाराओं में मुकदमा दर्ज किया जबकि ऐसे गंभीर स्थिति में कड़ाई से मामला दर्ज क्यों किया? कानून के अनुसार यह स्पष्ट रूप से गंभीर और जानलेवा हमला माना जा सकता था।

पीड़ित परिवार का आरोप है कि गिरार पुलिस ने आरोपियों को बचाने के लिए जानबूझकर कमजोर धाराएं लगाईं, ताकि उन्हें आसानी से राहत मिल सके।

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इतना ही नहीं, आरोपियों को पकड़ने के बाद भी धारा 151 में चालान कर दिया गया और उपजिलाधिकारी मड़ावरा द्वारा तुरंत जमानत दे दी गई। पीड़ित पक्ष की आपत्ति को नजरअंदाज कर दिया गया।

परिवार का आरोप है कि एक ही दिन में लेनदेन कर आरोपियों को छुड़वा लिया गया और उन्हें थाने में कुछ घंटों से ज्यादा नहीं रोका गया।

जमानत के बाद आरोपियों ने खुलेआम धमकी दी, जिसके चलते पीड़ित परिवार अपना घर छोड़कर छुप-छुपकर रहने को मजबूर हो गया।

31 मार्च को मामला और दर्दनाक हो गया, जब गर्भवती सुनीता को अस्पताल ले जाया गया और डॉक्टरों ने बताया कि गर्भ में ही बच्चे की मौत हो चुकी है। पीड़ित परिवार का कहना है कि यह मौत 10 मार्च की बेरहमी से हुई मारपीट का सीधा परिणाम है।

26 मार्च को जब परिवार न्याय की गुहार लगाने महरौनी कोर्ट गया हुआ था, उसी दौरान उनकी गेहूं की फसल को गांव के ही लोगों ने थ्रेसर से निकालकर उठा लिया। बाद में थोड़ी सी फसल वापस देकर मामला दबाने की कोशिश की गई।

पीड़ित परिवार ने पुलिस अधीक्षक, आईजी (Inspector General), डीआईजी (Deputy Inspector General) और डीजीपी (Director General of Police) को भी शिकायत भेजी, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—

क्या गिरार पुलिस की लापरवाही और कथित लेनदेन के कारण एक परिवार की जिंदगी बर्बाद हो गई?

क्या गंभीर चोटों और गर्भवती महिला की स्थिति को नजरअंदाज करना एक सामान्य प्रक्रिया है?

क्या आरोपियों को बचाने के लिए धाराएं कमजोर की गईं?

यह मामला अब निष्पक्ष जांच और उच्च स्तरीय हस्तक्षेप की मांग कर रहा है, ताकि सच्चाई सामने आ सके और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई हो सके।

रिपोर्ट – आर. के. पटेल
ललितपुर
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