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धवा की पुरज़ोर चुनौती: पंचायत-शिकायत और वीडियो सबूत के बावजूद अवैध पैकिट गाँव-गाँव तक — “बेचूँगा” कहकर दबंग कर रहा खुली चुनौती, पुलिस पर मिलीभगत/निष्क्रियता के आरोप

धवा की पुरज़ोर चुनौती: पंचायत-शिकायत और वीडियो सबूत के बावजूद अवैध पैकिट गाँव-गाँव तक — “बेचूँगा” कहकर दबंग कर रहा खुली चुनौती, पुलिस पर मिलीभगत/निष्क्रियता के आरोप

ललितपुर/मड़ावरा 

मड़ावरा की धवा पंचायत का ऐलान, महिलाओं की हिम्मत, ग्रामीणों के तीन-तीन नामजद लिखित शिकायती पत्र और चुपके से बनाए गए वीडियो — इन सबके तमाम सबूतों के बावजूद धवा गाँव में अवैध शराब का कारोबार आराम से जारी है। ग्रामीणों का कहना है कि सरकारी रजिस्टर्ड ठेकों से निकली पैकिटें (पैकिट/पेटियाँ) छुपा-छुपाई तरीके से गाँव-गाँव पहुंचती हैं और ठेकेदारों/डिलरों की मदद से खुलेआम बेची जाती हैं। जब लोगों ने कागज़ पर सबूत दे दिए और पंचायत ने सख्त दंड तय कर दिया तब भी वही दबंग — प्रेम अहिरवार — वीडियो में दहाड़कर कह रहा है, “बेचता हूँ, बेचूँगा… किसी से नहीं डरता।” यह चुनौती गाँववासियों के धैर्य का सहारा काट चुकी है और प्रशासन-पुलिस पर सवालों की तिजोरियाँ खुल चुकी हैं।
धवा के तीन दस्तावेज़ — पंचायत, शिकायतें और सामूहिक ज्ञापन — सबका हवाला गाँववालों ने दिया है। पहले लिखित पत्र में (ग्रामीणों द्वारा थाना मड़ावरा व उच्च अधिकारियों को भेजा गया) साफ लिखा गया कि प्रेम अहिरवार तथा उसकी माँ लगातार गाँव में शराब बेच रहे हैं और इससे महिलाओं-बच्चों व शांत वातावरण को भारी नुकसान हुआ है। इस पत्र पर रामप्रसाद, लालन सिंह, राजाराम, रामशरण, दयाराम, रामनिवास, छोटेलाल, महेश, धर्मेंद्र, सुरेंद्र, जगन्नाथ, हरीश और गोविंद जैसे दर्जनाम ग्रामीणों के हस्ताक्षर दर्ज हैं। उसी दिन हुई ग्रामसभा/पंचायत में सर्वसम्मति से शराबबंदी का प्रस्ताव पारित हुआ — जिसके दस्तावेज़ पर लालसिंह, जगन्नाथ, कुलदीप, रामनाथ, देवेंद्र, अशोक, सुनील, धर्मेंद्र, भगवानदीन, गंगाराम, हरिकिशन, रज्जू, कैलाश, अशोक कुशवाहा, बलराम, दिनेश, ओमप्रकाश, कल्लू, राजेश और मुन्नालाल सहित कई ग्रामीण मौजूद थे और उनके नाम-अंगूठे दर्ज हैं। बाद में तीसरे पत्र में भी स्थानीय प्रभावशाली हस्तियों और दो दर्जन से अधिक ग्रामीणों ने मिलकर पैनी शिकायत दी — जिनमें जगन्नाथ, रामनाथ, धर्मेंद्र, भगवानदास, हरिकिशन, कुलदीप, रामसजीवन, देवेंद्र, बलराम, कैलाश, मुन्नालाल, ओमप्रकाश, दिनेश, रज्जू, अशोक, गोविंद, सुरेंद्र, सुनील और महेश के नाम प्रमुख हैं। ये दस्तावेज़ और हस्ताक्षर जनता के स्पष्ट निर्देश हैं — गाँव में अब शराब नहीं बिकेगी।

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“किराने की दुकान में रखी अवैध क्वार्टरो की पेटी, महिला से खरीदता युवक — पंचायत व शिकायतों के बावजूद जारी धंधा।”

इन पत्रों के बाद भी जब गाँव के युवाओं ने छुपकर वीडियो बनाया तो वह evidence बन गया। वीडियो में प्रेम अहिरवार और उनकी माँ को नई-पैक्ड पैकिट घर लाते, दुकान में छिपाकर रखते और ग्राहकों को बेचते देखा गया। वीडियो में दबंग की वह जमकर उत्साही बोली लगातार सुनाई देती है — वह खुलेआम पंचायत और पुलिस को चुनौती देता है। ग्रामीणों का कहना है कि वीडियो में दिखने वाले पैकिट सरकारी ठेकों से निकले पैकिट ही थे, जो अनैतिक तरीके से—चादरों में छिपाकर—मोटरसाइकिल द्वारा ग्रामीण इलाकों तक पहुँचाई जाती हैं। गाँववाले पूछ रहे हैं: जब ठेके सरकारी हैं, तब ये पैकिट दुकान से कैसे सुरक्षित निकले और बिना रोक-टोक के गाँव तक पहुँच गए?
धवा और आसपास के इलाकों में शराब से जुड़े हादसों का इतिहास परेशान करने वाला है। ग्रामीण बताते हैं कि नशे की हालत में बढ़ती सड़कीय दुर्घटनाएँ, घरेलू हिंसा, बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होना और खेतों में काम में गिरावट अब आम बातें बन चुकी हैं। पिछले वर्ष धवा में शराब-प्रभावित चालक की वजह से हुई एक सड़क दुर्घटना में एक मासूम गंभीर रूप से घायल हुआ — यह वह घटना है जिसने महिलाओं और बुजुर्गों में बेचैनी को चरम पर पहुँचाया। रनगाँव की महिलाएं भी पहले ही थाने के सामने धरने पर बैठी और जान देने तक की हद तक जाकर अपने दर्द को आवाज़ दे चुकी हैं। इन सबका फलस्वरूप गाँव का सामाजिक ताना-बाना खिन्न और असुरक्षित हो गया है।
कानून स्पष्ट है — बिना लाइसेंस शराब बेचना आपराधिक कृत्य है और राज्य आबकारी नियमों के तहत दोषियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई का प्रावधान है; जब भी शिकायतें हों तो पुलिस पर आवश्यक कार्रवाई करने का दायित्व बनता है — छापेमारी, जब्ती, आरोपियों पर FIR और आपूर्ति श्रृंखला की तह तक जांच। पर धवा का नज़ारा यह दर्शाता है कि नियम कागज़ों तक सिमटे हुए हैं, ज़मीनी अमल नदारद है। तीनों लिखित शिकायतें, पंचायत का संकल्प और वीडियो-प्रमाणों के बावजूद थाने में कार्रवाही का अभाव ग्रामीणों के विश्वास को हिला रहा है।
अब दो ही व्याख्याएँ सभ के समक्ष हैं — या तो स्थानीय पुलिसकर्मियों की मिलीभगत है, जो आपूर्ति-श्रृंखला को संरक्षण देती है, या वहीं निष्क्रियता और लचर गश्त है जो अपराधियों को胆 (हौसला) दे रही है। गाँववाले स्पष्ट शब्दों में कह रहे हैं कि कई बार नामजद शिकायतें देने के बावजूद मात्र औपचारिकता पूर्ण नोटिस या कथित निरीक्षण के अलावा कुछ नहीं हुआ। ग्रामीणों का दर्द यह भी है कि ठेकेदार/डीलरों की गाड़ियों का गुजरना, पेटियों की आवाजाही और रात-दिन में पैकिटों का वितरण कैसे संभव हो रहा है — क्या स्टेशन हाउस के सामने यह सब अनजाने में हो रहा है या किसी संरक्षण का परिणाम है?
धवा का सवाल सीधे प्रशासन की ओर है — अगर सचमुच नियम सख्त हैं तो अभी क्यों नहीं? ग्रामीणों ने कार्रवाई की यही माँग रखी है: तत्काल FIR दर्ज कर आरोपियों की गिरफ्तारी, पकड़ी गई पैकियों की जब्ती, सरकारी ठेकों के विक्रेता-ठेकेदारों का लेखा-जोखा, और थाना स्तर से लेकर जिला प्रशासन के उच्चाधिकारियों तक एक पारदर्शी जांच। साथ ही ग्रामीण निगरानी समिति को पुलिस के साथ मिलाकर ठोस भूमिका देनी चाहिए ताकि पंचायत के निर्णय का अमल हो और दोबारा ऐसे मामलों की पुनरावृति रोकी जा सके।

कुछ दिन पूर्व रनगाँव की महिलाओं ने किया था पुलिस थाने के सामने चक्का जाम,

घटनाक्रम ने स्थानीय प्रशासन व पुलिस के लिए चुनौती खड़ी कर दी है—एक तरफ गाँव के दस्तावेज़-आधारित सबूत और सामूहिक आवाज है, तो दूसरी ओर एक दबंग व्यक्ति का खुला आव्हान और उसके पीछे की आपूर्ति व्यवस्था। अब निर्णायक कार्यवाही ही तय करेगी कि कानून की राजगद्दी गाँव के प्रहरी के हाथों मजबूत रहेगी या सामुदायिक न्याय के लिए लोग सड़कों पर उतरकर अपनी सुरक्षा खुद मांगेगे।
समाचार तक इस पूरे मामले का निष्कर्ष यह है: दस्तावेज़, हस्ताक्षर, पंचायत का संकल्प और वीडियो-प्रमाण — सब कुछ स्थानीय प्रशासन के समक्ष रखा जा चुका है। अब आवश्यकता है तुरन्त और पारदर्शी कार्रवाई की — न कि औपचारिक रिपोर्टिंग, बल्कि प्रभावी छापेमारी, जब्ती व आरोपियों के खिलाफ कठोर कानूनी प्रक्रिया। जब तक यह नहीं होगा, धवा का दर्द, रनगाँव की महिलाओं की पुकार और ग्रामीणों की हताश नारेबाज़ी बेअसर रहेगी। प्रशासन को चाहिए कि वह आज ही यह स्पष्ट करे कि किस तारीख तक क्या कदम उठा रहा है — वरना ग्रामीणों का अगला कदम सार्वजनिक आंदोलन और न्याय की मांग बनेगा, जिसकी पूरी जवाबदेही प्रशासन पर होगी।

रिपोर्ट: आर के पटेल
साथ — लक्ष्मण सिंह गौर, राजू कुशवाहा
टीम — समाचार तक – बेबाक खबर, बड़ा असर

नॉट-; संलग्न: (ग्रामीणों द्वारा थाने व उच्च अधिकारियों को भेजे गए तीन ज्ञापन/शिकायतों की फोटो-नकलें और स्थानीय युवाओं द्वारा निर्मित वीडियो फुटेज रिपोर्टर के पास उपलब्ध हैं।)

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