ललितपुर में पुलिस की मनमानी पर फूटा आक्रोश! बजाज फाइनेंस घोटाले से जुड़ी आत्महत्या और मुकदमों के विरोध में राजनैतिक दलों के साथ व्यापार मंडल ने किया हल्ला बोल
बेटे के जेल जाने के बाद पिता ने अपनी जान दी — शव सड़क पर रखकर प्रदर्शन, 53 नामजद व ~100 अज्ञात पर ‘गंभीर धाराओं’ में मुकदमा

ललितपुर (उत्तर प्रदेश)
जिले में बीते कुछ दिनों से एक ऐसी घटनाक्रम की श्रृंखला चल रही है, जिसने पूरे प्रशासन और पुलिस की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दिया है। बजाज फाइनेंस कंपनी लिमिटेड के ₹1.71 करोड़ के कथित घोटाले से शुरू हुआ मामला आज आत्महत्या, शव रखकर प्रदर्शन, मुकदमे और राजनीतिक हस्तक्षेप तक जा पहुँचा है।
कैसे शुरू हुआ पूरा मामला
ललितपुर कोतवाली पुलिस ने बजाज फाइनेंस कंपनी की तहरीर पर फर्जी दस्तावेज और नकली मुहर के आधार पर ₹1.71 करोड़ की धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज किया। इस मुकदमे में शिवम (शुभम) राठौर पुत्र लक्ष्मीनारायण राठौर समेत कई नामजद किए गए। पुलिस ने शिवम को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।
परिवार पर इस गिरफ्तारी का गहरा असर पड़ा। पिता लक्ष्मीनारायण राठौर (उर्फ लल्लू, उम्र लगभग 54 वर्ष, व्यवसायी) को यह चोट बर्दाश्त नहीं हुई। मानसिक दबाव और बदनामी के कारण वे टीकमगढ़ (मध्यप्रदेश) स्थित एक लॉज (गायत्री लॉज) में पहुंचे और वहीं उन्होंने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।

उनकी जेब से दो प्रार्थना पत्र बरामद हुए जिनमें साफ लिखा था कि उनके पुत्र को झूठा फंसाया गया है और जिला मजिस्ट्रेट से न्याय की गुहार लगाई गई है।
शव रखकर प्रदर्शन और इलाइट चौराहा जाम
आत्महत्या की सूचना से ललितपुर में भूचाल आ गया। परिजन और स्थानीय व्यापारी आक्रोशित होकर शव को इलाइट चौराहे पर सड़क पर रखकर धरने पर बैठ गए। घंटों तक चौराहा जाम रहा। लोगों ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए और कहा कि शिवम को झूठे मामले में फंसाकर जेल भेजा गया है।
सबसे दर्दनाक दृश्य तब सामने आया जब शिवम को पिता के अंतिम संस्कार में पैरोल पर लाया गया, और उसके हाथों में हथकड़ी लगी थी। इस दृश्य ने भीड़ को और ज्यादा आक्रोशित कर दिया। बाद में प्रशासन ने हथकड़ी हटवाई, लेकिन तब तक तस्वीरें जनता के बीच पुलिस की “निर्ममता” का प्रतीक बन चुकी थीं।
पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर ही दर्ज कर दिया मुकदमा
प्रदर्शन और शव रखकर जाम करने के बाद पुलिस हरकत में आई। मगर कार्रवाई दोषियों पर नहीं, बल्कि प्रदर्शनकारियों पर हुई। 53 नामजद और करीब 100 अज्ञात लोगों के खिलाफ गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज कर दी गई।
इस एफआईआर में प्रदर्शन में शामिल स्थानीय व्यापारी, समाजसेवी, यहां तक कि बीजेपी, कांग्रेस और सपा के नेताओं तक को भी घेर लिया गया। इस कदम ने मामले को और ज्यादा संवेदनशील बना दिया।

व्यापार मंडल और जनप्रतिनिधियों का मोर्चा
पुलिस कार्रवाई के खिलाफ व्यापारियों में गुस्सा और बढ़ गया। व्यापार मंडल ने कलेक्ट्रेट परिसर में धरना-प्रदर्शन कर पुलिस विभाग के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि पुलिस असली दोषियों को बचाने के लिए निर्दोष व्यापारियों को फंसा रही है।
व्यापार मंडल के नेताओं ने मुख्यमंत्री को संबोधित ज्ञापन जिला अधिकारी को सौंपते हुए पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग की। साथ ही यह भी कहा गया कि निर्दोष व्यापारियों के खिलाफ दर्ज मुकदमे तत्काल वापस लिए जाएं।
धरना स्थल पर जब पत्रकारों ने व्यापार मंडल के जिला अध्यक्ष से सवाल पूछे तो वह स्पष्ट जवाब देने से बचते दिखे और बार-बार मामले की जांच पर भरोसा जताते रहे।
अब राजनीतिक दबाव भी बढ़ा
इस पूरे घटनाक्रम ने न सिर्फ व्यापार जगत को बल्कि राजनीति को भी हिला दिया। भाजपा जिलाध्यक्ष हरिश्चन्द्र रावत ने खुद पुलिस अधीक्षक ललितपुर को पत्र लिखकर मामले की निष्पक्ष जांच कराने और थाना कोतवाली पुलिस की भूमिका की जांच की मांग की है।
पत्र में साफ कहा गया है कि शिवम राठौर को झूठा फंसाया गया और उसके पिता लक्ष्मीनारायण राठौर की आत्महत्या के लिए पुलिस की भूमिका संदिग्ध है। पत्र में पुलिस की कार्यप्रणाली को पक्षपाती बताते हुए कहा गया कि जनता में गहरा आक्रोश है और सरकार की छवि धूमिल हो रही है।
पत्र पर भाजपा के कई पदाधिकारियों और पूर्व जनप्रतिनिधियों ने भी हस्ताक्षर कर प्रशासन को चेताया है कि यदि मामले की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई तो व्यापारी और आमजन और बड़ा आंदोलन करेंगे।
पुलिस पर उठ रहे सवाल
क्या गिरफ्तारी निष्पक्ष थी या दबाव में की गई?
अंतिम संस्कार में हाथकड़ी लगाना मानवता के खिलाफ कदम क्यों था?

शव रखकर न्याय मांगने वालों पर ही गंभीर धाराओं में मुकदमा क्यों दर्ज हुआ?
असली दोषियों तक पहुँचने के बजाय जनता की आवाज़ दबाने का खेल क्यों खेला गया?

52 नामजद 100 अज्ञात पर FIR
ललितपुर की यह घटना सिर्फ एक पुलिस कार्रवाई नहीं, बल्कि जनता बनाम पुलिस की जंग का प्रतीक बन गई है। सवाल यह है कि क्या ललितपुर में सच बोलना और न्याय मांगना सबसे बड़ा अपराध बन चुका है?
जनता, व्यापारी संगठन और अब जनप्रतिनिधि —

सभी एक सुर में पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहे हैं। मुख्यमंत्री तक मांग पहुँच चुकी है। अब देखना होगा कि सरकार इस पूरे प्रकरण में क्या रुख अपनाती है।
✍ रिपोर्ट: आर के पटेल के साथ राजेश कुशवाहा, ललितपुर
समाचार तक – बेबाक खबर, बड़ा असर



