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मड़ावरा किला: करोड़ों का जीर्णोद्धार, फिर भी 15 अगस्त पर ध्वजा रोहण नहीं

ग्राम पंचायत की पहल से पहले हुआ था बाउंड्री, बॉल, लाइटिंग व वृक्षारोपण का काम, अब पुरातत्व विभाग के करोड़ों के बजट पर उठे सवाल

मड़ावरा (ललितपुर):

“मोराराज जी ने बनवाया था यह मराठाओं का किला; अब जीर्ण—सरकारी बजट खर्च हुआ, पर सम्मान नहीं”

ललितपुर जिले के ऐतिहासिक मड़ावरा किले को पर्यटन विकास और विरासत संरक्षण के तहत करोड़ों रुपये की लागत से संवारा जा रहा है, लेकिन इस 79वें स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त 2025) पर यहां ध्वजा रोहण तक नहीं हुआ। यह न केवल सरकारी आदेशों का उल्लंघन है, बल्कि स्थानीय जनभावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला मामला भी है।

ग्राम पंचायत की पूर्व पहल

कुछ वर्ष पूर्व मड़ावरा ग्राम पंचायत निधि से किले के मुख्य द्वार और आगे के हिस्से में बाउंड्री दीवार, बैठने के लिए बॉल, वृक्षारोपण और लाइटिंग का कार्य कराया गया था। यह पहल स्थानीय स्तर पर किले की सुरक्षा और सौंदर्य बढ़ाने की दिशा में अहम कदम थी।

करोड़ों का सरकारी बजट-

इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार के पुरातत्व विभाग ने ललितपुर जिले के चार प्रमुख किलों — बालाबेहट, सौरई, मड़ावरा और बानपुर — के जीर्णोद्धार के लिए कुल 12 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किया। इनमें मड़ावरा किले के लिए 2.40 करोड़ रुपये आवंटित हुए।
इस बजट से बाउंड्री दीवार, सौंदर्यीकरण और अन्य कार्य शुरू हुए, लेकिन वास्तविकता में न तो काम बजट के अनुरूप दिखाई देता है और न ही रखरखाव का स्तर मानक के अनुसार है।

गुणवत्ता पर उठ रहे सवाल-

निर्माण कार्य पूर्ण होने से पहले ही धशक के टूट गई सुरक्षा बाउंड्री वॉल

बाउंड्री दीवार का एक हिस्सा कुछ ही दिनों में टूटकर तालाब में गिर गया। यह न केवल कार्य की गुणवत्ता पर सवाल खड़े करता है, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था की पोल भी खोल देता है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर ध्वजा रोहण का आयोजन यहां हर वर्ष होना चाहिए, लेकिन इस बार पुरातत्व विभाग और प्रशासन की अनदेखी के कारण तिरंगा नहीं फहराया गया। पहले के वर्षों में यह कार्य ग्राम प्रधान की पहल पर संपन्न हुआ था।

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किले का ऐतिहासिक संदर्भ पुराने लोग बताते-

कस्बा मड़ावरा में स्थित यह किला—मराठा मोराराज जी द्वारा बनवाया गया था—जो अब खंडहर में तब्दील है। इसका निर्माण काल संभवतः 18वीं सदी के मध्य का है, जब बुन्देलखण्ड (Bundelkhand) में मराठा और स्थानीय राज्य अधिकारों की लड़ाई चली थी। इस किले में मुख्य द्वार (हाथी दल), अतिरिक्त द्वार, तालाब, तीन परकोटे और खाई जैसी संरचनाएँ थीं।
एक स्थानीय किवदंती के अनुसार, इस किले से सौरई किले तक एक गुप्त मार्ग भी होता था—लेकिन अब यह मार्ग मात्र लोककथाओं तक सीमित रह गया है। बाद में यह किला अंग्रेजों के कब्जे में चला गया।

स्थानीय लोगों की नाराज़गी

गांव के वरिष्ठ लोग बताते है कि ग्राम प्रधान निधि से किले की देखरेख की शुरुआत की थी। उम्मीद थी कि सरकारी बजट से यह स्थल और निखरेगा, लेकिन काम अधूरा और पर्व की अनदेखी देखकर निराशा हुई।”करोड़ों रुपये खर्च कर जीर्णोद्धार किया गया, फिर भी प्रतीकों का सम्मान और गुणवत्ता दोनों ही नज़रअंदाज़ हुए। यह जिम्मेदार विभागों की जवाबदेही का विषय है।”

सवालों के घेरे में विभाग

क्या ग्राम पंचायत की पहले से हुई पहल और सरकारी जीर्णोद्धार कार्यों में समन्वय की कोई योजना बनाई गई?इतने बड़े बजट के बावजूद सुरक्षा और प्रतीकात्मक आयोजनों को क्यों नज़रअंदाज़ किया गया? क्या आगामी राष्ट्रीय पर्वों से पहले ध्वजा रोहण और जनसहभागिता सुनिश्चित होगी?

निष्कर्ष

हाल ही में मड़ावरा कविले की हालत

मड़ावरा किला केवल एक ऐतिहासिक इमारत नहीं, बल्कि स्थानीय गौरव और राष्ट्रीय प्रतीक है। करोड़ों के बजट के बावजूद स्वतंत्रता दिवस पर यहां तिरंगा न फहराना प्रशासनिक लापरवाही का प्रतीक है। अब स्थानीय लोग उम्मीद कर रहे हैं कि जिम्मेदार विभाग इस गलती से सबक लेकर आगे से ऐसे अवसरों पर पूरी सजगता दिखाएंगे।

 

रिपोर्ट – आर.के. पटेल के साथ लक्ष्मण सिंह गौर, समाचार तक, बेबाक खबर, बड़ा असर

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