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शिक्षा के नाम पर लूट: प्राइवेट स्कूलों और किताब माफियाओं की मिलीभगत से गरीब अभिभावक लुट रहे, मड़ावरा में शिक्षा के नाम पर संगठित लूट!

प्राइवेट स्कूलों और किताब माफियाओं की साठगांठ ने गरीब अभिभावकों की जेबें खाली कर दीं – शिक्षा विभाग बना मूकदर्शक

मड़ावरा (ललितपुर)

बुंदेलखंड के ललितपुर जिले की मड़ावरा तहसील में शिक्षा अब अधिकार नहीं, व्यापार बन गई है। यहाँ के अधिकांश प्राइवेट स्कूल और किताब विक्रेता एक माफिया तंत्र बनाकर गरीब, ग्रामीण, कम पढ़े-लिखे अभिभावकों को खुलेआम आर्थिक शोषण का शिकार बना रहे हैं।

“मड़ावरा के लोग सच में गाय हैं, जिन्हें जब चाहा दुहा गया” – यह तंज अब सच साबित हो रहा है।

📌 मुख्य खुलासे एक नजर में:

प्राइवेट स्कूलों की मिलीभगत से चयनित दुकानों पर ही मिलती हैं किताबें और ड्रेस

किताबों पर नकली रेट स्टिकर लगाकर 40-50% तक की मुनाफाखोरी

GST बिल की जगह दी जाती है सादी कागज पर हाथ से लिखी रसीद

हर साल नया कोर्स, ताकि पुरानी किताबें न चल सकें

शिक्षा विभाग पूरी तरह निष्क्रिय – अब तक कोई कार्रवाई नहीं

सहरिया आदिवासी बच्चों का भविष्य सबसे ज्यादा प्रभावित

 

📚 कैसे चल रहा है लूट का यह शिक्षण कारोबार

मड़ावरा में प्राइवेट स्कूलों ने पुस्तकों और यूनिफॉर्म की आपूर्ति के लिए कुछ चुनिंदा दुकानों (जैसे कल्पना बुक डिपो, अप्सरा बुक डिपो) से “डील” कर रखी है।
अभिभावकों को निर्देश दिया जाता है कि सिर्फ इन्हीं दुकानों से किताबें व ड्रेस लें। वहां किताबों पर छपा असली रेट या तो छिपा दिया जाता है या ऊंचे दाम के नए स्टिकर चिपकाकर बेचा जाता है।

❌ ₹250 की किताब ₹400 में थमाई जाती है – बिना पूछताछ का मौका दिए।

 

💰 कमीशन का गणित: स्कूल को 15%, दुकानदार की लूट 50%

स्थानीय लोगों के अनुसार, किताब बेचने पर स्कूल को 10–15% का कमीशन मिलता है। लेकिन दुकानदार 40–50% तक का मुनाफा वसूलते हैं।
इससे यह स्पष्ट होता है कि यह पूरा तंत्र शिक्षा नहीं, शुद्ध व्यापार चला रहा है।

ऐसी पर्ची काटकर देते है कमीशन खोर दुकानदार,

🧾 GST बिल गायब, हाथ से लिखी पर्ची हाजिर!

अभिभावकों को वैध बिल नहीं दिया जाता। GST बिल की जगह दी जाती है सफेद पन्ने पर पेन से लिखी मनमानी कीमत वाली पर्ची।
इससे न उपभोक्ता फोरम में शिकायत की जा सकती है, न किसी विभाग में प्रमाण रखा जा सकता है।

यह एक सुनियोजित कानूनी ढाल है – लूट का प्रमाण बचाने के लिए।

📘 हर साल नया कोर्स – ताकि पुरानी किताबें काम न आएं

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प्राइवेट स्कूल हर वर्ष पाठ्यक्रम में परिवर्तन करवा कर नई किताबें छपवाते हैं, जिन पर स्कूल का लोगो, नया कवर डिज़ाइन और मनचाहा मूल्य प्रिंट होता है।
अभिभावक अब अपने बच्चों को पुराने छात्रों की किताबें आधे दाम पर नहीं दिलवा सकते, क्योंकि कोर्स ही बदल दिया जाता है।

यह कमाई बढ़ाने की चालाक रणनीति है।

📉 शिक्षा विभाग की निष्क्रियता – चुप्पी या साझेदारी?

अब तक न तो किसी किताब दुकानदार पर कार्रवाई हुई है, न ही किसी गैर मान्यता प्राप्त स्कूल पर शिकंजा कसा गया है।
शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन की चुप्पी यह बताने को काफी है कि या तो वे बेहद लापरवाह हैं या पूरी तरह मिलीभगत में शामिल।

राकेश तिवारी, मड़ावरा
तहसील अध्यक्ष ( बुन्देलखण्ड एकीकरण समिति)

🧒 सहरिया समुदाय के बच्चों के साथ अन्याय – NGO की प्रतिक्रिया

बुंदेलखंड एकीकरण नामक सामाजिक संस्था, जो सहरिया और आदिवासी बच्चों की शिक्षा व पोषण पर कार्यरत है, ने इस स्थिति पर गहरी चिंता जताई है।
संस्था के मड़ावरा तहसील अध्यक्ष राकेश तिवारी ने बताया कि –

> “यह संस्था स्वर्गीय विश्वनाथ शर्मा द्वारा सहरिया कल्याण के लिए बनाई गई थी। आज उन्हीं बच्चों की शिक्षा को लूटा जा रहा है। हम सांसद अनुराग शर्मा को पत्र लिखेंगे और कार्रवाई की मांग करेंगे।”

📢 अब सवाल जनता का है: क्या कोई सुनवाई होगी?

मड़ावरा की बड़ी आबादी शिक्षा के मामले में पहले से पिछड़ी है।
सरकारी स्कूलों की बदहाली और बंदी के बाद अब प्राइवेट स्कूलों ने किताब विक्रेताओं से मिलकर शिक्षा को मुनाफे का साधन बना लिया है।

अब सवाल उठता है कि –
🔹 क्या शिक्षा विभाग जागेगा?
🔹 क्या जिला प्रशासन कार्रवाई करेगा?
🔹 क्या दोषियों पर कानूनी शिकंजा कसेगा?

✅ जनहित में सुझाव:

शिक्षा विभाग द्वारा अधिकारिक पुस्तक मूल्य सूची प्रकाशित की जाए

बिना GST बिल देने वाले दुकानदारों के लाइसेंस रद्द किए जाएं

पाठ्यक्रम परिवर्तन की हर साल मॉनिटरिंग की जाए

NGO, जनप्रतिनिधि और सामाजिक संगठनों को स्थानीय निगरानी समिति में शामिल किया जाए

जिला स्तर पर अभिभावक हेल्पलाइन और शिकायत पोर्टल बनाया जाए

🖊 रिपोर्ट – समाचार तक: आर.के. पटेल
📍 स्थान – मड़ावरा, ललितपुर (उत्तर प्रदेश)

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